कोरा वैराग्य भी केवल भटकाव ही समझो।

कोरा वैराग्य भी केवल भटकाव ही समझो।

गुरूदेव श्री चन्द्रप्रभु ।।

 

 ब्रह्मचर्य,ओर ग्रहस्थाश्रम इन दोनों के पूर्ण होते  होते ही वानप्रस्थ ओर सन्यास ये दोनों ही जीवन के अनुभव से स्वयम प्रगट होते है ।जो वैराग्य में परिणित हो जाते है।यदि नही तो भटकाव समझो ।कोरा वैराग्य भी केवल भटकाव ही समझो।

क्यों कि आज तक जिन्होंने ब्रम्ह की उपलब्धि प्राप्त की जो ईश्वर ,भगवान कहलाए ।वे भी मेरे कथनअनुसार प्रथम दो ही चरण में ईश्वर कहलाए।

चाहे श्री राम अपनि मर्यादा से हो।या श्री कृष्ण अपने प्रेममय जीवन से हो ।भगवान महावीर अपनी अहिंसा ,बुध्द करूणा लिए क्यो न हो ।

ये सारे भगवत्ता को प्राप्त हुए।

ओर जिस मार्ग से गये उसका अनुभव लोगो तक पहुचाया ।

वह अनुभव उनका अपना था।मार्ग भी अपना था ।

वानप्रस्थ,ओर सन्यास का इनके जीवन मे स्थान कहाँ ।

इन्हें तो वैराग्य मिल चुका था।

मनुष्य चाहे तो प्रथम दोनों आश्रमों का पालन कर अभी भी एक नया मार्ग बनाकर अहम ब्रह्मसी को प्राप्त कर सकता है ।

जो उपदेश श्री कृष्ण ने दिए तुम भी देने लगोगे ।ग्रंथो की रचना करने लगोगे ।कारण ...

प्रयेक आत्मा परमात्मा का अंश ,अर्थात बीज हे ।केवल उसे सींचने की ओर बड़ा करने तक कि आवश्यकता है।

 

श्री कृष्णम वन्दे जगत गुरु ।।

श्री सद्गुरु सेवा संस्थान इन्दोर ।