गृहस्थी या ग्रहस्थ जीवन को ग्रहस्थाश्रम भी कहते है ।

गृहस्थी या ग्रहस्थ  जीवन को ग्रहस्थाश्रम भी कहते है ।

गुरुदेव श्री चन्द्रप्रभु ।।

 

गृहस्थी या ग्रहस्थ  जीवन को ग्रहस्थाश्रम भी कहते है ।

यह केवल मनुष्यो पर ही लागू नही होता ।पशु, पक्षी ,औऱ वनस्पति जगत भी इसके दायरे में है ।

यदि यह ग्रहस्थ जीवन न होता ,तो यह हमारी धरती भी मंगल ग्रह,चांद की तरह वीरानी ही होती ।

गृहस्थ जीवन मे आनंद कम और नियम बद्धता के साथ संघर्ष अधिक है ।

हर गृहस्थी जीव अपने तरीके से मानव सेवा ,जीव सेवा करता है ।उसके एवज में जो भी पारितोषिक प्राप्त करता है ।उसी पर स्वयं औऱ परिवार का भरण पोषण आधारित है। उसमे से भी मानव सेवा जीव सेवा में खर्च करता है ।

इससे बड़ा धर्म ,कर्म हो ही नही सकता ।

परन्तु यह कठिनाइयों ओर संघर्ष से भरा है ।गृहस्थी के नियम पर चलने वाला व्यक्ति किसी साधु ,संत से उसकी ईश्वरभक्ति ,आध्यात्मिकता , और साधुता कम आंकी नही जा सकती ।

मानव सेवा , जीव सेवा ,से बढ़कर संसार मे कोई बड़ा धर्म नही है ।

जिसे यह गृहस्थी निभाता है ।

ब्रह्म ऋषि नारद जी को एक बार सबसे बड़े नारायण भक्त होने का अहंकार होने पर भगवान श्री नारायण ने एक ग्रहस्थ कृषक को उनका सबसे बड़ा भक्त सिध्द कर दिया ।अतः ग्रहस्थाश्रम श्रेष्ठ आश्रम है ।वैराग का मार्ग भी यही ,मुक्ति का मार्ग भी यही , भक्ति का मार्ग भी यही ।

गृहस्थी में रहकर भी ईश्वर भक्ति में समय देने वाला ,माया ,मोह, अहंकार को वश में करके जीव दया  करे ,ऐसा व्यक्ति सन्त होता है 

परन्तु गृहस्थी के नियम तोडने वाला ,लोगो को दुःख देने वाला ,रिश्वत,लूट,जीव हत्या ,अहंकारी,लालची ,ऐसा

ग्रहस्थ मानव जाति के लिए ओर जीव,एवं वनस्पति जगत के लिए घातक है ।

ईश्वर उसे कभी माफ नही करता । 

ग्रहस्थ जीवन जीने की शिक्षा हम भगवान श्री राम और माता सीता से  ले सकते है।

रामायण यह गृहस्थी जीवन जीने का आधार व सरवोच्च शिक्षा प्रद धार्मिक ग्रंथ है ।

 

जय श्री कृष्णा

श्री कृष्णम वन्दे जगतगुरू

श्री सद्गुरु सेवा संस्थान इंदौर