ब्रह्मचर्य की प्रारंभिक शिक्षा

ब्रह्मचर्य की प्रारंभिक शिक्षा

गुरुदेव श्री चन्द्रप्रभु ।।

 

ब्रह्मचर्य की प्रारंभिक शिक्षा , व गृहस्थाश्रम के अनुभव ओर मनुष्य केआंतरिक शुद्द भावो के परिवर्तन से चौथा आश्रम सन्यास नही ,वह पूर्ण ब्रम्ह जैसे आचरण वाला ब्रह्मचारी ,बन जाता है ।

प्राचीन काल मे बड़े और ऋषि महात्मा स्त्रियों को आशीर्वाद देते थे ,कहते थे दस पुत्र और ग्यारवा पुत्र तेरा पति हो ।

जब पत्नी की दृष्टि व आंतरिक भाव पति के प्रति पुत्र जैसे हो जावे ।ईसमे कहि न कही चौथा आश्रम सन्यास से भी आगे का आभास होता है ।ब्रह्म बनने जैसा नजर आता आता है ।

शिशु के जन्म के पश्चात स्त्री में मातृत्व भाव जागृत होते है, वह सबको पुत्र रूप में देखने लगती है ।

माँ शब्द ईश्वर शब्द से बड़ा माना गया है ।स्त्री जब दीक्षा लेती है ,तब उसे माँ शब्द से सम्बोधित किया जाता है ।यह शब्द व्यक्ति के ह्रदय में श्रद्धा उत्तपन्न करता है ।

माँ के प्रति श्रद्धा स्वाभाविक है ,और माँ की पुत्र के  प्रति ममता ।

स्त्री और पुरुष के काम वासना के विलीन हो जाने पर पति को पुत्र रूप में देखना असम्भव नही है ।

जब पत्नी पति को पुत्र रूप में देख सकती है ,तो पति को भी पत्नी के भीतर माँ को खोज लेना बड़ी बात नही है ।

यह आंतरिक भावो का एक दूसरे पर प्रभाव ,ग्रहस्थ जीवन की आंतरिक खोज का अनुभव मात्र है ।

ग्रहस्थाश्रम में व्यक्ति के लिए ब्रम्हचर्य का पहले आश्रम की शिक्षा ही चौथे आश्रम सन्यास नही ब्रह्म +चर्या =  ईश्वर जैसे आचरण वाला बन जाना है ।

 

श्री कृष्णम वन्दे जगत गुरुम 

श्री सद्गुरु सेवा संस्थान इन्दोर।