मनुष्य के जन्म और मृत्यु के बीच तीन पड़ाव और भी है..

मनुष्य के जन्म और मृत्यु के बीच तीन पड़ाव और भी है..

गुरुदेव श्री चन्द्रप्रभु !!

 

मनुष्य जीवन में अध्यात्म।

मनुष्य के जन्म और मृत्यु के बीच तीन पड़ाव और भी है । 

बचपन, जवानी ,और बुढापा,       इनमे अंतिम पड़ाव मृत्यु है ,जो सबसे शक्ति शाली है। वह इन पाँचो पड़ाव के बीच  कभी भी आ सकती है।

इन पांचों पड़ाओ को पार कर मोक्ष प्राप्त करना बड़ा कठिन  और दुर्लभ है ।

जन्म तो भाग्य भरोसे ही समझो, इसमे हमारा कोई बस नही चलता।मनुष्य जीवन मे इतना ही कहूँगा की भाग्य केवल तीन बार ही मदद करता है ।पहला जन्म के समय ,दूसरा विवाह और तीसरा मृत्यु के समय ।यह तीनों ही ईश्वर ने अपने हाथ मे ले रखे है ।बाकी जीवन मनुष्य को अपने स्वयं की इच्छा अनुसार जीने की स्वतंत्रता दे रखी है ।

जैसे भाग्य तीन बार उदय होता है ,या मदद करता है।वैसे ही मनुष्य की तीन अवस्थाएं ,या पड़ाव ईश्वर ने निश्चित कर दिए है । बचपन ,जवानी , और वृध्दावस्था।यदि हम तीनों का परीक्षण करें तो ,

पहले बचपन :::::!!

पूरा बचपन ईश्वर भरोसे। यदि  आप इसे सत्य मानते हो तो अपना पूरा जीवन ही भगवान भरोसे क्यो नही छोड़ते ? यदि आप ऐसा करते है ,तब देखना आप कितने निश्चिंत ,सुखी और आनंद महसूस करते है ।लेकिन मनुष्य ऐसा करता नही ।अपनी ही शक्ति ,बुद्धि से जीना चाहता है ।और ईश्वर पर भरोसा कम ,कम तो क्या नही के बराबर करता है ।और ज्यादा से ज्यादा दुःख उठाता है।

बचपन मे शक्तिहीन ,दुसरो पर आश्रित ,परन्तु सारा बचपन ही ईश्वर भरोसे ।

सारी व्यवस्था माता पिता के रूप में या अन्य किसी के भी रूप में ईश्वर मदद करता है ।और बचपन का पूरा सफर तय हो जाता है ।

जीवन का दूसरा पड़ाव,(अवस्था ) जवानी :::::: !! 

जवानी मनुष्य जीवन का एक निश्चित समय और मानसिकता का नाम है।जीवन का भरपूर आनन्द से भरा अनुभव करना ही जवानी है ।

सुडौल बांहे , भरा हुआ चेहरा   शक्तिशाली शरीर , जवानी नही है । जवानी पॉजेटिव इच्छाशक्ति का नाम है। जिसमे आपके सोच विचार जितने सत्य और धर्म पर चलने वाले होंगे ,उतनी आपकी जवानी की प्रगति निश्चित है । निर्भयता नये नये काम करने की क्षमता ,संसार मे कुछ नया करके दिखाने का उत्साह का नाम ही जवानी है ।नये नये अनुभव लेने की कुछ नया सीखने की इच्छा का नाम ही जवानी है ।

जवानी और बुढापे के बीच का समय लगभग कुछ मनुष्यो का यूही गुजर जाता है। वृध्दाअवस्था में भी यदि इच्छाशक्ति का उपयोग करे ,जिसमे जो बच गए हो ,जो न कर पाए हो ।उन्हे पूरा करने मे यदि मनुष्य लग जाता है तब तो वह अभी भी जवान है ।कौनसा नया काम करना ? कुछ काम नही तो अपनी क्षमता अनुसार आस पास के लोगो की मदद करने की आदत को भी जवानी ही कहेंगे । अंतिम समय तक इच्छाशक्ति अनुसार कार्य करते रहने को ही जवानी कहते है ।

तीसरा पड़ाव या जिसे अवस्था भी कहते है ।वह है वृद्धावस्था ::::::::!!

जिसमें त्वचा पर झुर्रियां , शरीर कमज़ोर ,बाल सफेद होना आदि ,जिसमें मनुष्य कमजोरी महसूस। करता है।

आत्मा कमजोर होना आत्मा में झुर्रियां पड़ने जैसा है।जिसमे चिंता ,घबराहट अपने आप मे अविश्वास पैदा होना। डर ,और निराशा यह सब बूढ़ा बनने के लिए पर्याप्त है। जिसमे बढ़ती हुई इच्छाशक्ति समाप्त होने जैसी होती है ।जवानी समाप्त होने जैसी ही समझो ।

अंत तक जवान रहने के लिए बचपन मे बालक पैरो का चुम्बन लेने का जो प्रयत्न करता है ।वह प्रयत्न अंत तक बनाए रखना ही जवानी है ।

छोटे से बालक का हँसना ,आश्चर्य चकित होना ,सदैव प्रयत्नशील रहना , अपने जीवन को ईश्वर भरोसे छोड़ देना । 

ऐसा जीवन ही सुखमय जीवन है, ऐसा जीवन ही जवान है ।ओर महत्वपूर्ण भी है ।

 

श्री कृष्णम वन्दे जगत गुरु।

श्री सदगुरू सेवा संस्थान इंदौर